28 April, 2011
05 January, 2010
तुम्हारा इंतजार है..
काफी दिनों बाद कोई पोस्ट करने जा रहा हूँ.. बीते दिनों मसरूफियत ने कुछ घेर सा रखा था सो वक्त नहीं निकाल पाया कुछ पोस्ट करने का.. मग़र बकरे की माँ कब तक खैर मानती आख़िर.. इसलिए आज आ ही गया शायद ही कोई ऐसा पुराने गानों का आशिक हो जिसने हेमंत कुमार का नाम न सुना हो.. और जिसने हेमंत दा का नाम सुना है उसमें शायद ही कोई हो जिसने ये गीत न सुना हो.. तुम पुकार लो.. तुम्हारा इंतज़ार है.. बोल बेशक़ गुलज़ार साहब के हैं.. इस नगमें के साजों में रवां गहराई और इसके अल्फाज़ों में जज़्ब मोहब्बत इसके फनकारों की अज़ीम शख्सियत बयां करती है.. सुनते सुनते ऐसा लगता है के सुनने वाला किसी अलग जहाँ में चला गया है.. एक अँधेरी रात की तस्वीर ज़हन में बन जाती है.. दूर से लगता है के कोई पुकार रहा है.. गोया चंद साजों और लफ़्ज़ों से भी जादूगरी होती है.. हालांकि इस गीत को सुनकर पहले भी कई जज़्बात दिल में आये थे मगर उस रोज रुक नहीं पाए और कागज पर उतर गए.. उसी साज़.. उसी धुन पर कुछ अलफ़ाज़ बिठाने की कोशिश की है.. गुलज़ार साहब की बराबरी करने का तो सोच भी नहीं सकता.. मगर कोशिश की है के नगमें के जज़्बात बरकारार रख सकूँ..
तुम पुकार लो.. तुम्हारा इंतजार है..
ख़्वाब चुन रही है रात.. बेकरार है.. तुम्हारा इंतजार है
मुद्दतों से तक रहे तेरी राह हम..
कब से सिर्फ कर रहे तेरी चाह हम..
दर्द फ़ासलों में यूँ बेशुमार है.. तुम्हारा इंतजार है
मुन्तज़िर रहेंगे हम तेरी आस में..
छोड़कर रहें कहाँ दिल.. तेरे पास में
ख्वाहिशें हज़ार पर.. इख़्तियार है.. तुम्हारा इंतजार है
हम करीब हो न हो.. दिल करीब है..
दास्ताँ तेरी मेरी कितनी अजीब है..
दरमियाँ दिलों के बस.. ऐतबार है.. तुम्हारा इंतजार है

found at bomb-mp3 search engine
04 November, 2009
आंच
दहकती शब के दामन में उस रोज़तेरी साँसों से जब टकराई थी मेरी सांसें
सरगोशियों की लवों से जब
हमने उजली की थी रात की हथेली
उस तवील लम्स के दौरां
रफ्ता-रफ्ता उठती तपिश ने
जलाई थी कुछ तेरे भीतर
कुछ मेरे भीतर की चिंगारी
उस रात आखिर बार
जिन बुझते रिश्तों का अलाव तापा था हमने
तड़के मैंने देखा है आज
उसकी राख में कुछ आंच बाकी है अब भी
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1917 Hrs
3rd November, 2009
Bangalore
11 October, 2009
मेरा खुदा

लगती हैं रोज़ लम्बी.. लम्बी सी ये कतारें
चढ़ चढ़ के एक दूजे.. के ऊपर से हैं सब बढ़ते
फैली हुई है हर सू धूपों की ये खुशबू
मावों के चढावों से भर गए हैं इबादतघर
सिक्कों और नोटों के गट्ठे चढ़ चुके हैं
कहीं पंडों की आरती है.. कहीं मौलवी की अजां है
फ़लक पर हरि ॐ.. या अल्लाह की पुकारें हैं
बस इस भीड़ में ना जाने.. मेरा खुदा कहाँ गुम है..
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1949 Hrs.
3rd August, 2008
Bangalore
04 October, 2009
वो जो इक शाइर था..

तुमने इक मोड़ पर अचानक जब
मुझको 'गुलज़ार' कहके दी आवाज़
एक सीपी से खुल गया मोती
मुझको इक मानी मिल गए जैसे
'गुलज़ार'.. इस नाम को किसी त्आर्रुफ़ की ज़रूरत नहीं.. एक अलग अंदाज़.. एक अलग-अंजान सी तरतीब.. एक सफ़ेद कुरता.. एक पुराना चश्मा.. और दरिया के जैसे अज़ीम तसव्वुर.. किसी और का तो नहीं पता लेकिन जब भी इनकी कोई नज़्म, त्रिवेणी या ग़ज़ल पढता हूँ तो जाने कैसा मीठा सा एहसास सर से पांव तक दौड़ जाता है.. 'गुलज़ार' साहब ने सही मायने में ज़िन्दगी के फलसफे को अपने सुखन में जिया है.. आम ज़िन्दगी का कोई भी एक हिस्सा उठाके उसे लफ्जों में इस तरीके से बांधा है के उसके पोशीदा हिस्से नज़र में आने लगते हैं..
क्या पता कब.. कहाँ से मारेगी
बस, के मैं ज़िन्दगी से डरता हूँ
मौत का क्या है.. एक बार मारेगी
कई बार समझ में नहीं आता के ये इक सुखनवर है या के इक फ़ल्सफ़ी है.. पता नहीं.. बस इतना ज़रूर मालूम है के ये इक आम इंसान ज़रूर है जो ज़िन्दगी के हर पहलू से वाकिफ़ है.. और कहीं न कहीं मेरा शायद कोई ताल्लुक ज़रूर है जिससे ..
वो जो इक शाइर था
दफ़्न आहटों की आवाज़ से जो
बुनता रहता था मीठे साजों के ताने
तोड़कर वक़्त के गुच्छे से सदा
जमा करता रहता था कुछ कच्चे-कुछ पक्के से लम्हे
यारी चाँद से बहुत थी उसकी शायद
घंटो साए में उसके बैठे-बैठे
करता रहता था था जाने क्या क्या बातें
उठा लाता लफ्जों की बूंदे जाने कौन से दरिया से
फिर फेंककर उनमें तसव्वुर अपना
बना देता था उनको मुक़द्दस पानी
वो जो इक शाइर था
वो जो इक शाइर है
ना सिलवटें ही बदल पायी हैं उसकी रूह
समझ में आता नहीं उसको क्याकर के मैं कहूँ
गुलज़ार जिसको कहती है दुनिया
मेरा वाकिफ है वो किसी मुमकिन..
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2320 Hrs.
3rd October, 2009
Bangalore
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